9. 'कविता' पर कविताएं


'बीसवीं सदी, इक्कीसवी सदी' से लेकर 'अर्धरात्रि है यह...' तक उन्होंने लंबा सफर तय किया है। बीसवीं सदी...' यदि सदियों के यथार्थ को चित्रित कई कवि अपनी रचनाधर्मिता के दौरान कल्पना लोक में विचरण करते हैं और कविता कैसे लिखी जाती है? कविता का उद्देश्य क्या है? कविता की उम्र कितनी होती है? किसी भी कविता के कालजयी होने के लिए उसमें किन-किन गुणों की आवश्यकता होती है? क्या कविता समाज में परिवर्तन ला सकती है? अगर ला सकती है तो किस स्तर पर? आदि सवाल उच्च श्रेणी के कवियों के मस्तिष्क में उठते रहते हैं और वे उनका उत्तर अपने विचारों में गोते लगाते हुए निकालने का प्रयास करते हैं।

डॉ. प्रसन्न कुमार बराल ने कवि सीताकांत महापात्र से साक्षात्कार लेते समय यह सवाल पूछा कि आप कविता कैसे लिखते हैं? कितना समय लगता

है? एक बार लिखने के बाद क्या आप दुबारा संशोधन करते हैं? डॉ. बराल

के दो सवाल नवोदित साहित्यकारों के मन की बात प्रस्तुत करते हैं। उस पर

कवि सीताकांत जी ने उत्तर दिया था कि कविता आवेग से पैदा होती है। यह

आत्मा का अपना एक दस्तावेज है, इसलिए कविता किस तरह लिखी जाए,

इसका कोई सीधा उत्तर नहीं होता। कभी-कभी मन में आई हुई पहली पंक्ति को

मैं लिख देता हूं, मगर आगे की पंक्तियां और नहीं लिख पाता। वैसे पहली

पंक्ति के लिए कभी - कभी उचित योग्यतम दूसरी पंक्ति पाने के लिए

दीर्घकाल तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मैं कभी-कभी एक ही बार में सारी

कविता लिख लेता हूं। मगर जब मुझे लगता है, जो मुझे कविता में कहना था

नहीं कह पाया तो मैं उसे वहीं छोड़ देता हूं। लगभग चार-पांच महीने के बाद

फिर से मैं उस कविता की ओर लौट आता हूं। दूसरी तरफ जब उसे सवाल है

कि जब मैंने अपनी कविता में ठीक-ठीक लिख दिया है तो फिर मैं उसके साथ

छेड़खानी नहीं कर सकता। लंबी कविता के लिए कई शृंखलाओं का ध्यान

रखना पड़ता है। इसलिए उनकी रचना में मुझे अधिक समय लगता है। लेखन

के बाद उसमें कुछ संशोधन करने पड़ते हैं। कभी-कभी बिना किसी संशोधन

के कविता चल जाती है। इसलिए इस प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर मैं कह सकता

हूं-

"मैं प्रतिक्षण कविता लिखता हूं।"

,

-

ऐसे ही कुछ प्रश्न उमाशंकर सिंह परमार ने कवि सुधीर सक्सेना से पूछे।

जैसे कविता क्यों लिखी जाती है? क्या कविता की जरूरत जीवन में कभी

महसूस होती है? क्या हर एक अनुभव कविता बनता है? तो उनका उत्तर था-

"यदि आप मनुष्य है, यदि आप जीवन जी रहे हैं। जीवन में छोटे-मोटे

संघर्ष हैं। सुख है। दुःख है। पीड़ा है। स्वप्न है। तो निश्चित ही कविता की

जरूरत है। यदि जीवन में संघर्ष होते तो शायद कविता की जरूरत होती।

कविता एक एहसास है। जिन पीड़ाओं को हम भोगते हैं या जिन पीड़ाओं से

संवेदित होते हैं, वह संवेदना जब शब्दों के सहारे व्यक्त होती है तो वह

कविता कहलाती है। कविता हर युग में मनुष्यता की जरूरत है। कोई युग

बिना कविता के नहीं रहा है और रहेगा। कविता मनुष्य और मनुष्यता की

पहचान है। वही अनुभव कविता बनता है, जिससे आदमी संवेदित होता है।

क्योंकि संवेदना ही भाषा देती है। भाषा कहीं बाहर से नहीं आती। कवि उसे

अपनी संवेदनाओं से निचोड़ता है। संवेदनाओं की वैचारिक उपस्थिति में

बदलकर प्रस्तुत करना या विचारों के अनुरूप आधुनिक बनाकर प्रस्तुत

करना कविता है। इसलिए हर अनुभव को कविता कहना गलत है क्योंकि हर

अनुभव संवेदना नहीं बन सकता है।"

सुधीर ने सीताकांत के इस कथन से अपनी सहमति व्यक्त की कि कवि

प्रतिक्षण कविता लिखता है। उन्होंने अपने समानधर्मा कवि की रचना-प्रक्रिया

से भी सहमति जताते हुए कहा कि उनकी काव्य-प्रक्रिया का भी यही 'सच'

है।

-

 

 

जिसे कवि सुधीर सक्सेना 'संवेदना' नाम से संबोधित कर रहे हैं, उसे

प्रश्न सोचने योग्य है कि अपने भीतर 'काव्य-सत्ता' की उपस्थिति को आपने

सीताकांत महापात्र 'काव्य-सत्ता' कहते हैं। इस संदर्भ में डॉ. बराल का यह

किस उम्र में अनुभव किया, उस बिरले अनुभव को अगर शब्दों में ढाला जाए

तो आप उस पर क्या कहना चाहेंगे?

सीताकांत जी इसका उत्तर देते हैं:

"जी, वास्तव में यह बिरला अनुभव है। जो कुछ मैं इस विषय पर कहना

चाहता हूं उस अनुभव को उन शब्दों का सटीक विवरण दे पाऊंगा या नहीं

कह नहीं सकता, क्योंकि यह अनुभव मेरे कृतित्व से परे है। फिर भी यह

कहना चाहूंगा कि यह अनुभव मुझे अपने स्कूल जीवन से प्राप्त हुआ था। उस

समय मैं स्कूल में पढ़ा करता था। उस समय एक अध्यापक थे, उनका नाम था

गोपाल मिश्र। उनके प्रयास से स्कूल में प्रकाशित होने वाली एक हस्तलिखित

पत्रिका को देखकर मैं साहित्य की ओर आकृष्ट हुआ। उस समय मैं पिताजी

की रामायण, महाभारत, भागवत और गंगाधर की कविताओं की ओर बहुत

आकर्षित हुआ। उस समय के अनुभव को भुलाया नहीं जा सकता। घर

परिवार और गांव में जिस बोलचाल की भाषा का व्यवहार किया जाता था, उसे

मैंने एक अनन्य ढंग से अनुभव करते हुए प्रयोग में लाना शुरू कर दिया।

आज भी मुझे अच्छी तरह याद है मेरी माता की प्रतिदिन कही जाने वाली

अनेक नीति-ज्ञान की बातें। कभी-कभी जब मैं उदास होता था, वह कहती

थी, अरे ! जाल में फंसी हुई चिड़िया की तरह क्यों बैठे हो? ऐसे और अनुभव

जितना मैं आपको बताता हूं, फिर भी लगता है बहुत कुछ अनकहा छूटा जा

रहा है।"

कुछ और सवाल जो दोनों कवियों में अच्छी खासी समानता रखते हैं, वे

हैं उन्हें कविता लिखने की प्रेरणा किससे मिलती है? उनकी कविताओं के

 

 

पात्र कौन होते हैं ? उनकी कविता किन चीजों से प्रभावित होती है? डॉ. प्रसन्न

कुमार बराल इन सवालों को मिलाकर कवि सीताकांत जी से पूछते हैं ..

"आपने अपनी कविताओं में गांव, नदी, प्रकृति विशेषकर चित्रोत्पला पर

चित्रांकन किया है, इन सभी चीजों के अलावा परिवार, परिवेश और अब

संबंधियों ने आपको किस तरह प्रभावित किया है ?'' तो उनका उत्तर होता है-

"गांव, परिवेश, प्रकृति और चित्रोत्पला नदी के प्रति मैं अपने मोह को

भाषा में अच्छी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। मैं जीवन भर प्रकृति प्रेमी रहा है।

पेड़, पौधे, जंगल, नदी, पहाड़, पर्वत जिस तरह मुझे आकर्षित कर पागल कर

देते हैं, उन्हें शब्दों में व्यक्त करने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इस प्रकृति के

भीतर नीरस जीवन जीने वाले आदिवासी शायद मेरे लिए इतने प्रिय हैं। बाकी

रह गई बात निर्दिष्ट नदी चित्रोत्पला की। जिस दिन से मैं समझने लगा हूं,

चित्रोत्पला मेरे जीवन में इस तरह अंतरंग हो गई, मानो मेरे भीतर लहू बनकर

बह रही हो और मेरे मन मस्तिष्क के समस्त स्नायु-ग्रंथियों पर अपनी उपस्थिति

का गहरा प्रभाव छोड़ते हुए जा रही हो। मैंने सारी दुनिया का भ्रमण किया है।

देश-विदेश की नदियां, समुद्र, जल-प्रपात सभी को जब-जब मैं देखता हूं

तब-तब चित्रोत्पला को मैं अपने हदय में पाता हूं। मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने

अपने गांव और चित्रोत्पला के बगैर कहीं समय बिताया हो। परिवेश और

आस-पास के मनुष्यों के प्रभाव से क्या कभी मुक्त होना संभव है?"

इसी प्रश्न को घुमाकर उमाशंकर सिंह परमार कवि सुधीर सक्सेना से पूछते

हैं कि मैंने आपकी कविताओं में चरित्रों के संदर्भ में व्यापक परिवर्तन देखे हैं।

आपके अपने लोग भी हैं, अपना शहर भी है, चरित्र भी है। इससे आपको नहीं

लगता कि आप रचनात्मक जोखिम उठा रहे हैं?

सीताकांत जी की ही तरह सुधीर सक्सेना उत्तर देते हैं, "जिस तरह अपने

लोग चरित्र बनते हैं तो शहर, गांव, नदी, पहाड़ क्यों नहीं चरित्र बन सकते

हैं? हम जिस प्रकृति के सान्निध्य में रहते हैं वह चरित्र क्यों नहीं बन सकती

 

 

है? वह भी तो हमारी संवेदनाओं का सूत्र है। क्या हमारा पर्यावरण हमें संवेदित

नहीं करता? देखिए, जो भी इंसान से जुड़ा है, जिससे इंसान प्रभावित होता है,

या हो सकता है वो सभी तत्व चरित्र बनने की पूरी योग्यता रखते हैं।"

सुधीर कहते हैं, "केन नदी के बिना बांदा नहीं है, जैसे अरपा के बिना

बिलासपुर नहीं। बीकानेर, हवेलियों के बिना अकल्पनीय है। दिल्ली कालिंदी

और अमेरिका नियाग्रा प्रपात के बिना अधूरा। मस्क्वा को मस्क्वा नदी और

लेनिनग्राद को नेवा नदी रचती है। हम सबके बचपन की एक नदी होती है,

जो आजीवन बहती है। व्यक्ति और स्थान हमारे जीवन में अहमियत रखते हैं।

हमारा समय हमें रचता है। कविता जीवन का बखान है। उसकी व्याख्या भी।

कुछ भी वर्जित नहीं है कविता के लिए।"

सीताकांत महापात्र नवोदित रचनाकारों के लिए जहां पढ़ने की अनिवार्यता

पर बल देते हैं कि लेखन कार्य में व्यय हो रहे समय की तुलना में पांच गुना

पढ़ना चाहिए। केवल साहित्य ही नहीं इतिहास दर्शन, संस्कृति, नृत्य और

अपनी इच्छा के अनुरूप अनेक विषय। सीताकांत जी बहुत अच्छे पाठक हैं।

साथ ही साथ अत्यंत अध्ययनशील भी। सन् 2010 में टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट

द्वारा जारी की गई शताब्दी की सौ प्रभावशाली पुस्तकों में से 85 पुस्तकें उनकी

पढ़ी हुई थी। किताबें पढ़ना उनका सबसे बड़ा शौक है और उन्हें अपनी

सर्वश्रेष्ठ संपत्ति मानते हैं। नई पीढ़ी के कवियों के लिए सुधीर सक्सेना जी

सलाह देते हैं कि सभी मनुष्यों की अपनी-अपनी अलग-अलग वैचारिक

स्थितियां होती हैं, अतः सब अपने विचारों के अनुरूप ही सलाह स्वीकार

करते हैं। फिर भी जनवादी लोकधर्मी धारा हिन्दी की मौलिक धारा है। नए

कवियों को समय के साथ नई भाषा लेकर रचना करनी चाहिए। उनके

मुताबिक कवि का अध्ययन व्यापक और विशद होना चाहिए। उसे विभिन्न

संकायों और अनुशासनों को जानना चाहिए। कविता परखनली में लंबी अदृश्य

 

 

रासायनिक प्रक्रिया के उपरांत उत्पन्न अवक्षेप की मानिंद है। कवि के लिए

अध्ययन, अनुशीलन और अभ्यास मायने रखते हैं। पढ़कर लिखने में दोहराव

का खतरा होता है, लेकिन जमीन में यथार्थ की कचोट से उत्पन्न भाषा का

प्रभाव कुछ और होता है। हमें कविता के लिए कविता या शौक के लिए

कविता लिखकर सरोकार के लिए लिखना चाहिए, तभी हिन्दी कविता

अपनी मौलिक संचेतन दशा को बरकरार रख पाएगी।

डॉ. सीताकांत महापात्र जहाँ पढ़कर लिखने में बल देते हैं, वहां यद्यपि

सुधीर सक्सेना को मौलिकता खोने यानी दोहराव का खतरा नजर आता है,

मगर नई भाषा तो आप तभी पकड़ पाओगे, जब आप अत्यंत ही अध्ययनशील

होंगे और कविता का उद्देश्य भी तभी सार्थक होगा, जब उसमें निहित कुछ

चिंतन समाज की दशा-दृष्टि बदलने में मदद करेगा। कहने का बाहुल्य यह है

कि दोनों कवि यथार्थ के साथ-साथ अध्ययनशीलता और सोद्देश्य कविता

लिखने पर विशेष बल देते हैं।

कवि सीताकांत महापात्र अपनी पुस्तक 'लैंडस्केप ऑफ इंडियन लिटरेचर

में संकलित आलेख 'पोएट्री इन अवर स्पिरिटेल्स टाइम्स' में कहते हैं कि हर

कवि यथार्थ के छुपे हुए अनेक रूपों को जानता है। कविता लिखने का उद्देश्य

उन छुपे हुए रूपों में केवल संबंध, तारतम्य स्थापित करना है, वरन् उसे

भाषा के वलय में ढालना भी है। यह तभी संभव हो सकता है कि कवि के

अंदर एक नहीं अनेक मनुष्यों का निवास हो। पिकासों की भाषा में

मल्टीट्यूड हो। किसी भी कवि का यूनिवर्स खाली होकर काफी सघन होता

है, जहां यथार्थ स्वप्न और कल्पना के अनेक आकार आते-जाते रहते हैं तथा

उसके अंतस में पिघलकर एक ठोस रूप ग्रहण करते हैं। दुर्भाग्य से हमारे

समय में मनुष्य केवल सपने देख सकता है, कल्पना कर सकता है। यह हमारे

कल्पना की सतत यात्रा है, जो आवश्यक मानवीय गुणों पर कुठाराघात करती

 

है। नीत्शे ने एक उल्लेखनीय टिप्पणी की है-

हम अपनी सच्ची सर्जनशीलता को इतनी ज्यादा सपनों में खर्च कर देते हैं

कि हमारी जाग्रत जिंदगी लड़खड़ाने लगती है। गॉड पार्टिकल की खोज क्या

इस दिशा में रहस्यवाद से पर्दा उठाने वाला कदम नहीं है?

आधुनिक समय की संवेदनहीनता को देखकर कभी-कभी लगता है कि

कवि बनना ही व्यर्थ है, क्योंकि कविताओं का वास्तविक दुनिया से कोई खास

सरोकार नहीं होता। अपनी मृत्यु से पूर्व विक्षिप्त ग्रीक कवि Holdertin ने ऐसा

ही दुःखी करने वाला प्रश्न पूछा था- आधुनिक संवेदनहीन जमाने में कवि

बनने की जरूरत क्या है?

ग्रीक कवि के इस सवाल का जवाब अपने मित्र नरेन्द्र जैन को याद करते

हुए सुधीर सक्सेना ने अपनी कविता 'बचा है कविता में यकीन' में दिया है।

उसकी कुछ पंक्तियां:

"अभी भी तुम्हारी कविता में

बजता है ग्रामोफोन

और उसकी सुई अटकती नहीं

एक बार भी

कभी अकेले तो कभी अतीत के संग

कामू, काफ्का और सार्च के संसार में

मनचाहा विचर तुम लौट आते हो

अपनी दुनिया में

तीता के माथे पर झूल आयी लटको

हौले से सहेज

सचमुच पीछे छूट गया है आनंद भवन

अब तो बस यही आनंद है

 

 

कि शेष है कविता का आनंद

यकीनन तुम्हारे होने से

बचा है कविता में यकीन"

अभी भी कविता की इस जमाने में भी कई संवेदनशील मित्रों को देखकर

लगता है कि दुनिया खत्म नहीं हुई है। कुछ यकीन अभी भी जिंदा है। जबकि

कवि सीताकांत महापात्र यथार्थ पर ग्रीक कवि "Holdertin" के समर्थन

करते हुए अपनी बात रखते हैं। अपने कविता संग्रह 'तीस कविता वर्ष की

कविता 'कविता, फिर एक बार' में वे कविता की सीमाओं का विश्लेषणात्मक

आकलन करते हुए लिखते हैं

"किसी को कभी बचा नहीं पायी कविता

बारूद से, विस्फोट से

भाले की नोंक से, बंदूक से

अग्नि से, असूया से

पत्थर से, पश्चाताप से

शेर के मुंह से या सामूहिक हिंसा से।

जानता हूं शब्दों में कोई जादू नहीं होता

उसके हाथों नहीं गलती दाल तक।"

सुधीर सक्सेना भी कविता के क्षय में विश्वास करते हैं, तभी तो उन्हें लगता

है कि थोड़ा-बहुत कविता के बचे रहने का यकीन है जब आस-पास परिवेश,

समाज और उसमें रहने वाले समस्त प्राणी संवेदनशील हो। एक दूसरे के सुख

दुःख को समझने का सामर्थ्य रखते हो। कवि सीताकांत महापात्र उस कविता

को व्यर्थ मानते हैं, जिसका समाज की उन्नति में कोई स्थान नहीं है। कविता

का सच्चा उद्देश्य ही हमारे इर्द-गिर्द के परिवेश, मनुष्य और समाज को

 

 

जागरूक करना होता है। कवि सीताकांत महापात्र आलोचक की भूमिका में

'लैंडस्केप ऑफ इंडियन लिटरेचर' में संकलित अपने आलेख 'पोएट्री सर्च

फॉर सजेस्टिव मैजिक' में कविता के उद्देश्य पर विचार करते हैं। आधुनिक

कविताओं के संदर्भ में आर्थर रिम्बॉड का उदाहरण देते हुए उसे 'tomfoolery'

की संज्ञा देते हैं। 20 वर्ष की उम्र में ही आर्थर रिम्बॉड ने कविता लिखना छोड़

दिया था : I gave up that tomfoolery long ago.

अनवरत कविता हमेशा अपने और दूसरों के बीच होने वाले तनाव को

प्रकट करती है। हमारे शास्त्रों में स्व (अपने अस्तित्व) का वर्णन आता है।

कवि स्व के अलग-अलग स्तरों से भली-भांति परिचित होता है। योगी महापुरुष

अन्नमय, प्राणमय, ज्ञानमय, विज्ञानमय कोश से परे आनंदमय कोश की ओर

गमन करता है, जबकि कवि इन पांचों कोशों में ही चक्कर काटता रहता है।

सारे कोष उसके 'स्व' के धरातल पर एकत्रित हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कवि

घोषणा करता है

"I am lots of people."

मगर सीताकांत जी इस आलेख में यह भी लिखते हैं कि कोई कवि

नुक्कड़ में एकत्रित भीड़ में खड़ा होकर अपने नारों को बुलंद होने में साहित्य

की आशा रखता हो। बात यह भी नहीं है कि कवि अपने सर्जन कक्ष में

विचरण कर रहा हो या फिर गलियों में सामाजिक गतिविधियों का ब्यौरा ले रहा

हो। कोई भी सच्चा कवि हर समय अपने सर्जन कक्ष में भी होता है और गलियों

में भी। लोकोक्ति आती है - 'हाट मध्ये ब्रह्मज्ञान।'

काफ्का ने एक जगह इसकी तारीफ करते हुए लिखा : "एक सच्चा

सर्जनशील लेखक ठंड से कांपते हुए बच्चों की तरह संगीत नहीं निकालता है

और ही धर्मोन्माद भक्तों की तरह तोड़-मरोड़ कर अपने शब्दों का उच्चारण

करता है अथवा मूर्तियों के सामने जितना उनका विश्वास नहीं हो, उससे ज्यादा

अंग हिला हिलाकर नृत्य करता है।"

 

कविता में 'मैं' और 'अन्य' का अंतर्द्वद्व होता है। अपने एकाकीपन से

इंकार करने तथा 'अन्य' के अस्तित्व का अनुभव ही कविता है। सार्च को

नायक घुटन अनुभव करने लगता है, जब उसे यह लगने लगता है कि वह

लालची, लोभी, यांत्रिक और भौतिकवादी विचारधारा वाले लोगों से घिरा हुआ

है। इस चीज को बिना अनुभव किए वह 'एकाकी' हो जाता है।

रामायण, महाभारत, भागवत पुराण आदि महाकाव्यों में कविता का स्थान

सार्वभौमिक रहा है। ऐसे काव्यों की रचना के लिए औपचारिक शिक्षा की

कतई आवश्यकता नहीं है। भक्ति काल में वाचिक परंपरा के आधार पर

कविता करने वाले संतों में कबीर, सूरदास, तुकाराम आदि का नाम आदर से

लिया जाता है। कबीर का दोहा हैं :- 'कबीर खड़ा बाजार में..' अर्थात्

कवि के लिए बाहर और भीतर दोनों का संतुलन अति अनिवार्य होता है।

आधुनिक संवेदनशील कवि अपनी कविताओं में 'एक्सटेंडेड स्पेस' तथा

'सजेस्टिव मैजिक' खोजते हैं।

कवि सीताकांत की तरह कवि सुधीर सक्सेना की कविता को 'मैं और

'दूसरे' के बीच होने वाले अनवरत तनाव की विचारधारा को समर्थन देते हैं।

अपने मित्र ओम भारती के नाम पर लिखी गई कविता 'कविता की आंख से

जमाना' की ये निम्न पंक्तियां द्रष्टव्य हैं :

"तुम कविता की आंख से देखते हो

जमाने को

और बतलाते हो बेहिचक

कि किसकी चित्तियां असली है

और किसकी धारियां फरेब?

बाजार से निकलते ही

तुम टांग देते हो कविता की लाल तख्ती

 

 

चेतावनी के साथ

यह अंधेर नगरी है

और यहां है बाजीगरों, नक्कालों, सौदागरों

और सूदखोरों का राज।"

कवयित्री मधु शर्मा को समर्पित उनकी एक कविता 'क्यारी में कविता' का

गुलाब में भी सीताकांत की विचारधारा परिपुष्ट होती नजर आती है। कवि

भीतर और बाहर दोनों के बीच सामंजस्य बनाता है।

"लड़की की रगों में बहते हैं शब्द

और कविता बन फूटते हैं

कविताओं के बिछौने पर सोती है लड़की

खुले आसमान तले निर्विकार।

शब्दों की पालकी में बैठ

रात-बिरात अचानक

चली आती है लड़की

भेड़ियों से बचती-बचाती

वक्त के घावों से सराबोर

घाव जितने अधिक त्वचा पर

उससे कहीं अधिक मन पर।"

कवि सीताकांत महापात्र ने 'तीस कविता वर्ष' में संकलित दीर्घ कविता

'कविता का जन्म' में कविता कैसे जन्म लेती है पर दृष्टिपात करते हुए उसे

स्पष्ट किया है। कविता की कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैं :

"अक्षर-अक्षर में मेरा पुनर्जन्म

 

 

मृत्यु मेरी प्रत्येक शब्द के कोण में

ध्वनित मेरा जीवन

क्षण क्षण उच्चारण में

स्वप्न और दृश्यों के सम्मोहित

सातवें आंगन में।

इतने सपनों के लिए

भले रातें कहां

दिन कहां

इतने दृश्यों के लिए।"

सीताकांत जी के अनुसार मन की शांत स्थिति में कविता जन्म लेती है,

जिसके लिए नीरवता अनिवार्य है। उनकी कविता नीरवता में कवि का निम्न

काव्यांश उल्लेखनीय है :

"पिता, नाना पूर्व पुरूष

उन्होंने शब्द ही छोड़े

कितने वे शहर

हरेक एक-एक विश्व पृथ्वी

स्वयं अनन्य वस्ख, स्वयं ही उपमा

लगता है, वे ही सारे शब्द

घेरे हुए हैं हमें

अनादिकाल में उच्चारित

उसी शब्द से

एक भी गुमा नहीं, टूटा नहीं

 

 

सारा आकाश भरापूरा

उन्हीं शब्दों की भीड़ से

वही सारे शब्द आहत हृदय की डूबी दिलासा से

शोक आनंद हंसी रोने की

इच्छा में, हुंकार श्रृंगार की वेदना के।"

समय के अनुरूप भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी लेखन कार्य भी प्रभावित होता है। डॉ

सीताकांत महापात्र ने अपनी पुस्तक 'Hinterland of Creativity : Es-

says and Lectures' में संकलित अपने आलेख 'Time to say our Few

words' में लिखा है, "हम मानव इतिहास के उस समय में रह रहे हैं, जो

शायद सबसे ज्यादा जटिल, ज्यादा बोझिल और ज्यादा डिमांडिंग है। बहुत

पहले ही ईश्वर को मृतक घोषित कर दिया गया है। मगर हम मनुष्य जिंदा है

और रहेंगे, भले ही अच्छे सही, बहुधा 'बीमार ही सही।' वे लोग काफी

सौभाग्यशाली रहे होंगे, जिन्होंने जीसस को सुना होगा और उसके आदेशों का

अनुपालन किया। जीसस ने कहा होगा- "मेरा अनुसरण करो। कोई भी

आदमी अपने हल को हाथ नहीं लगाएगा और पीछे नहीं मुड़ेगा, वह आदमी

ही ईश्वर के राज्य का हकदार होगा।' ईसा के शिष्यों ने सब-कुछ छोड़कर

उसका अनुसरण किया। अपना जाल, अपनी नाव अपने घर-परिवार सब-

कुछ छोड़कर उसका पीछा किया। ईसा ने कहा- "कल के बारे में बिल्कुल

मत सोचो। कल अपनी वस्तुओं के बारे में अपने आप सोचेगा, प्रलय के दिनों

तक।"

मगर आज सर्जनशील लेखक उत्सुकता से पूछते हैं, हम कहां जाएं?

किसका अनुसरण करें? कब हम मायाजाल से ऊपर उठे? क्या हम अपने

असक्षम शब्दों से अपने पाठकों को प्रभावित कर सकेंगे? और आखिरकार,

क्या मृतक ईश्वर या छोटे भगवानों का यह राज्य है? रचनाकार और लेखक.

 

सीताकांत महापात्र और सुधीर सक्सेना

दो कवि : एक दृष्टि

-

के तौर पर यह शंका सदैव बनी रहती है। शायद माया से बंधे रहना हमारा

भाग्य है, हमारी आत्मा और उसके रहस्यवाद के सिवाय हम किसी और का

अनुसरण नहीं कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, हम संसार और मोक्ष के बीच

फंसे रहते हैं। मैं जानता हूं कि हम उस काल में जिंदा है, जिसमें रहस्यवाद को

कोई स्थान नहीं है और आत्मा के अस्तित्व के बारे में कोई लिखना ही नहीं

चाहता है। मेरे लिए ये दोनों यथार्थ हैं। बीथोवन, वान गॉग, मंदेलश्ताम और

कबीर ने दोनों यथार्थों पर काम किया है। निस्संदेह आधुनिक युग में सर्जनशील

कला, कविता, साहित्य का स्थान सिकुड़ता जा रहा है। कई चुनौतियों तथा

अन्य ताकतों के कारण कवि, सर्जनशील लेखक हाशिए पर शंख बजा रहा

है। क्या इससे समाज को कोई लाभ है अथवा हानि? कभी-कभी मैं सोचता हूं,

हाशिए पर रखना भी उचित प्रतीत होता है, ताकि लेखक समाज से दूर रहकर

अपनी अंतरात्मा में खोकर प्रतिबद्धता के साथ समाज के प्रति इज्जतपूर्वक

अपनी भूमिका अदा कर सके। मैं ऑक्टोवियो पॉज के शब्दों में आस्था रखता

हूं। "लेखक को एकाकीपन बर्दाश्त करना चाहिए। उसे अपने आपको

हाशिए पर महसूस करना चाहिए। यह अभिशाप भी है, तो वरदान भी।"

आगे सीताकांत जी लिखते हैं कि जब मैंने नेरूदा, पॉज, बोर्गस, यानिस

रित्सोज, इलियट, रिल्के को पढ़ा तो अपने अंतस के धरातल से खींचने की

प्रक्रिया उनके अनुभव, बिंब, यथार्थ को प्रकट करने वाली भाषा की जानकारी

हुई। एकबारगी मेरे मन में यह ख्याल आया कि कविता की सार्थकता शून्य है।

क्या किसी कविता / गीत ने वियतनाम पर बम गिराने से रोका था? चंद्रोदय की

किसी कविता ने थियानमैन चौक पर टैंक को जाने से रोका? गांधीजी ने अपने

एक पत्र में रवीन्द्रनाथ टैगोर को लिखा था, "मैं कबीर के दोहे या चौपाई से

किसी भूखे की भूख नहीं मिटा सकता।'

 

दूसरी तरफ मैं शब्दों की ताकत से भी परिचित हूं। कुछ लोगों ने एक

व्याभिचारिणी स्त्री को पत्थरों से मारे जाने पर ईसा की राय जाननी चाही तो

 

 

उन्होंने कहा कि उस पर वे लोग ही पत्थर चलाएं, जिन्होंने कभी पाप किया

हो। अंत में किसी ने उस पर पत्थर नहीं चलाया, यह है शब्दों की अपरिमित

ताकत।

सर्जनशीलता अत्यंत ही नाजुक कार्य है, जो कवि के व्यक्तित्व के साथ-

साथ विषयवस्तु, बिंब तथा शब्द तीनों के साथ सम्यक संबंध स्थापित करती

है। काव्य सर्जनशीलता, भाषा और परंपरा के बीच द्विपक्षीय संबंध को प्रकट

करती है। किसी भी कवि के लिए कविता का प्रत्येक शब्द मौलिक और

अद्वितीय होना चाहिए, मगर वह शब्द आता कहां से है? सांस्कृतिक धरोहरों

एवं ऐतिहासिक विरासतों तथा ध्वन्यालोक से प्रभावित होकर। ऑक्टोवियो

पॉज दूसरे शब्दों में कहते हैं- "शब्दों के साथ हिंसा करना ही काव्य-

सर्जनशीलता की शुरूआत है।"

मानव सभ्यता शब्द और विचारों का समुच्चय है। किसी संवेदनशील कवि

के अतिरिक्त कोई भी इस शब्द को नहीं समझ पाते हैं कि यह संबंध उनके

रक्त में घुला हुआ है। इतिहास, विचार, संवेदना और युक्ति का प्रदाता होता

है। हमारे देश में अगर व्यास और वाल्मीकि नहीं होते तो आज साहित्य की यह

परंपरा हमें देखने को नसीब नहीं होती। ऑक्टोवियो पॉज इसे इस रूप में देखते

हैं - "कविता सीधी खड़ी हुई भाषा है, जब भाषा काव्यात्मक होती है तो

प्रत्येक शब्द एक उपमा का रूप धारण करता है और जैसे वह गुप्त संक्रिया

समाप्त होती है तो वह विस्फोट के लिए तैयार होता है। मगर जो कविता पढ़ता

है, उसके भीतर उस शब्द की सर्जक शक्ति संचालित होती है।"

"Hinterland of Creativity" में उद्धृत उपरोक्त विचार सीताकांत

जी के आलेखों से लिए गए हैं और उनकी छाप उनकी तथा कवि सुधीर

सक्सेना की कविताओं में खोजने का हम प्रयास करते हैं। चूंकि ये विचार

उनके अपने हैं। अतः उनकी किताबों में तो अवश्य मिलेंगे ही, मगर यही

विचारधारा अन्यत्र किसी दूसरे कवि की कविताओं में मिलने लगती है तो

 

 

कवियों के विचारों की साम्यता, सदृश्यता और सार्वभौमिकता नजर आने

लगती है।

सुधीर सक्सेना के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कवयित्री डॉ. यशस्विनी

पांडेय ने 'कविता ने जिसे चुना' में विस्तार से लिखा है। वह लिखती हैं-

"इतिहास, भूगोल, खगोल, ज्योतिष, देश-विदेश, राजनीति, साहित्य, दर्शन,

संस्कृति या कोई भी मुद्दा छेड़ दीजिये और बस फिर आप अवाक रह जाएंगे

सुधीर जी के अगाध ज्ञान से। यदि किसी की रचना की सत्यता की जांच करनी

हो तो उसके व्यक्तित्व को परखने, समझने या जानने के अलावा और कोई

विकल्प नहीं होता। अक्सर लिखने वालों की भाषा कुछ और होती है और

व्यवहार में वे दूसरे तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं। वे जैसा लिखते हैं, वैसे

ही बोलते भी हैं। उर्दू, हिन्दी, संस्कृत भाषाएं एक तहजीब मे गूंथ कर उनके

मुंह से फूटती हैं। भाषा के स्तर पर ही नहीं, विचार, व्यवहार, संस्कार के स्तर

पर भी उनकी कथनी-करनी-लिखनी में कोई अंतर नहीं। यह उनसे मिलकर

बेहतर जाना जा सकता है।

यशस्विनी आगे लिखती हैं, “ विचारधारा के स्तर पर मैं सुधीर जी को

किसी श्रेणी में नहीं रखना चाहूंगी। नागार्जुन, मुक्तिबोध, विजेन्द्र, केदार

या और भी तमाम प्रतीकात्मक वर्ग। नए कवि, पुराने कवि। वस्तुतः ऐसे

लोग किसी वर्ग को समृद्ध नहीं करते, बल्कि खुद के व्यक्तित्व और रचनाकर्म

से एक वर्ग का निर्माण करने की क्षमता रखते हैं। जैसे भारतेन्दु युग, प्रेमचंद

युग, प्रसाद युग, छायावाद युग जैसे काफी युग और वाद हिन्दी मे समय-समय

पर आये हैं। हर युग या वर्ग में हम देखते हैं कि किसी एक तरह की विशेषता

रहती है- एक तरह की कहानी, एक तरह की कवितायें, एक तरह के गद्य।

पर सुधीर जी जिस बहुआयामी रचना क्षेत्र में हैं, उसमें कहीं भी एकरसता का

स्वाद नहीं मिलता।

गद्य की बात करें या पद्य की, सब अलग-अलग देशकाल में लिखे

 

 

विभिन्न विधाओं से समृद्ध हैं। किसी शहर की बात करेंगे तो वहां के इतिहास,

भूगोल, धर्म, संस्कृति, प्रकृति, रहन-सहन सब शब्दों मे निचोड़ कर रख देंगे।

कविता लिखेंगे तो भाव को निकाल कर रख देंगे, चाहे लम्बी कविता हो या

छोटी दोनों में बराबर कुशलता हासिल है। उनकी कविता को पढ़ना केवल

पढ़ना नहीं होता, उस भावजगत और कालखंड को जीने जैसा होता है।

कविता के शब्दों का तो क्या ही कहना? जाने कब के भूले-भटके शब्दों

को सामने लाकर रख देते हैं। उनकी भाषा संपदा भी उनके व्यक्तित्व की तरह

ही समृद्ध है। हर विषय से उनके शब्द आये हुए होते हैं। भाषा में एक तरफ

गरिमा है, दूसरी तरफ गंभीरता। एक तरफ ताज़गी है, दूसरी तरफ रवानगी।

एक तरफ प्रवाह है, दूसरी तरफ अनुशासन। कल्पना के क्षेत्र में जितनी ऊंची

छलांग लगा कर चंद्रमा से बांसुरी बजवा देते हैं, यथार्थ की भूमि पर आकर

उतने ही सरल और सहज बन जाते हैं। सुधीर जी का हर काव्य-संग्रह दूसरे

से बिलकुल जुदा। अगर किसी को कवि का नाम मालूम हो, तो वह जान

नहीं पायेगा कि एक ही व्यक्ति इन भिन्न-भिन्न धरातल के काव्य-संग्रहों का

प्रणेता है। यह भिन्नता आस्वाद, विषयवस्तु, शिल्प, भाषा, भाव, विचार,

बिम्ब, प्रतीक और भी तमाम स्तर पर मिल जाएंगे। काव्य-संग्रह में इस बात

की भी भिन्नता है कि किसी में आपको प्रेम से सम्बन्धित अलग-अलग

कवितायें मिलेंगी, किसी एक ही काव्य-संग्रह में भिन्न-भिन्न विषयों पर, किसी

में एक ही विषय पर अलग-अलग कवितायें। 'ईश्वर हां नहीं तो' में अलग-

अलग कवितायें हैं, पर विषयवस्तु एक ही है ईश्वर। उसके बारे में तमाम

सवाल, तर्क, वाद-विवाद, व्यंग्य, संदेह, आस्था-अनास्था से जुड़े और गुंथे

हैं, जिसे एक सांस में ही पढ़ने का मन होता है, पर सांसों की सीमा होती है, मन

की भले हो। 'किरच-किरच यक़ीन' नामक काव्य-संग्रह में भूगोल, विडम्बना,

किताब, कमल, पानदान, सेलिब्रिटी, बचपन, खतरा, एकांत, त्रासदी जैसे

विषय को कविता का विषय बना कर अपने जिस अनुभव संसार को व्यक्त

.

किया है, वह विराट है।

यशस्विनी पांडेय कहती हैं - "उनके व्यक्तित्व की तरह उनका लेखन

भी है। वह अपने रचनात्मक कौशल से अपनी विविधवी छवि रचते हैं। वह

विभिन्न विधाओं या अनुशासनों में बहुत सहज भाव से बेझिझक आवाजाही

करते हैं। उनका पत्रकारीय लेखन देखिये। उनके 'इंडिया न्यूज' के संपादकीय

पढ़िये। या फिर 'दुनिया इन दिनों' में 'फ्रॉम डेस्क ऑफ चीफ एडिटर' के

आलेखों से गुजरिये। उनमें गजब का 'पोएटिक एलीमेंट' है। उनका ओशो

और ओशो कम्यून का वृत्तांत पढ़िये या फिर कछाल में मिलेनियम के सूर्योदय

की कथा। वे किसी कवित्त से कम नहीं। शब्दों का निर्झर है वहां। अद्भुत

लालित्य। अनूठा विन्यास। उनके लेखन के सर में लोल-लहरों का नर्तन

देखते ही बनता है। हिन्दी का दुर्लभ और लगभग लुप्तप्राय हो चुका ठाठ

सुधीर के लेखन में अपने समूचे सौन्दर्य और बांकपन के साथ उपस्थित है।

उनके लेखन में तंज भी है, चुहल भी है और गांभीर्य भी। वह फूल को उसके

रंग-रूप और मकरंद के साथ लेकर उपस्थित होते हैं। दिलचस्प तौर पर फूल

के साथ भ्रमर भी दिख जाए, तो विस्मय नहीं। उनका पत्रकारीय लेखन

ऊबाऊ, नीरस या शुष्क नहीं है। उनके इसी वैशिष्ट्य ने 'माया' के जरिए

करीब पाव सदी के अंतराल में उनकी सामान्य पत्रकारों से अलग छवि

सिरजी। इसी तरह कविताओं में वह चरित्रों और स्थानों को इस तरह आंकते हैं

कि देखते ही बनता है। उनकी कविता हमें क्रास्नाया प्लोशद (मस्क्वा), ग्रेट

वाल (चीन) अथवा पीटर मारित्जबुर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में इस तरह ले

जाती है कि उनके अक्स हमारे जेहन में खूबसूरती से चस्पां हो जाते हैं। उनकी

कविता हमारी मुलाकात लेनिनग्राद की रजत रातों, थाईलैंड की मछलियों

वाली स्त्री, बीकानेर की हवेलियों, श्रीलंका के नैसर्गिक सौन्दर्य, मुंबई के

गिटार बजाते समुद्र से भी बखूबी कराती है। हम जीवन में कम लोगों से नहीं

मिलते, अलबत्ता उनकी कविताओं की मार्फत नये लोगों और चीजों से मिलना

 

 

भरबांह भेंटना या उन्हें शिद्दत से जानना हुआ करता है। अपने राजनीतिक

लेखों में भी वह सूचित नहीं, वरन 'संसूचित' करने से जाने गये। उनकी गद्य

कृतिगोविंद की गति.' देखिए। अनन्य हिन्दी सेवी सेठ गोविंददास का

जीवन चरित औपन्यासिक कृति से कम नहीं है। वह गांधी-युग और आजादी

की लड़ाई का वृत्तांत है। वह बायोग्राफी भी है। मेमॉयर भी। वहां अद्भुत

'ब्लेण्डिंग' है। प्रयोगधर्मिता और नवोन्मेष सुधीरजी का वैशिष्ट्य है। उन्होंने

 

करती है, तो 'अर्धरात्रि है यह...' समकाल की विभीषिका को दर्शाती है।

वरिष्ठ पत्रकार और कवि अनिल विभाकर सुधीर को अग्निमय शब्दों और

बहुआयामी ध्वनियों के कवि के तौर पर देखते हैं। वे लिखते हैं, “ समकालीन

हिंदी कविता अपने विकास के कुछ ऐसे घुमावदार और उतार-चढ़ाव के दौर

से होकर गुजरी है जिसमें कुछ दृढ़ स्वर अनसुने कर दिए गए और वे अकेले

और अचीन्हे रह गए। यही वजह है कि ऐसे दृष्टिकोण और सर्जनात्मकता की

प्रगतिशील सजगता से लैस दर्जनों कवियों को दिल्लीवादी कुचाल की उपेक्षा

और निर्ममता झेलनी पड़ी। इसके पीछे महत्वाकांक्षाएं भी रहीं, गुटबाजी भी

और षड्यंत्र भी। साहित्य के साथ यह राजनीतिक खिलवाड़ एक कुटिल

प्रतिबद्ध विचारधारा के पोषण के लिए किया गया। इसके कारण हिंदी साहित्य

निरंतर अपठनीय और अविश्वसनीय होता चला गया। यह आलोचकीय षड्यंत्र

पिछले ढाई दशकों से कुछ ज़्यादा ही रहा। हिंदी के महत्वपूर्ण कवि सुधीर

सक्सेना उन्हीं रचनाकारों में हैं, जो ऐसी उपेक्षा और निर्ममता के शिकार हुए।

 

में कविता को छिपाए हुए सुधीर सक्सेना अपने सहयात्री कवियों में बेहद

साहित्यिक दायित्व के तौर पर पत्रकारिता और अंतः व्यक्तित्व की उर्वर भूमि

प्रामाणिक हस्तक्षेपकारी और प्रतिबद्धतापूर्ण जगह रखते हैं। उन्होंने उदय

प्रकाश, ज्ञानेंद्रपति, आलोकधन्वा और देवीप्रसाद मिश्र के साथ अपनी लेखनी

को काव्योन्मुख किया और प्रसिद्धि की सीढ़ियां चढ़ते हुए अब जाने-पहचाने

हो चले। यह प्रतिष्ठा अर्जित करने में काफी वक्त और श्रम लगा, जबकि

इनके सहयात्री कवियों में से दो-एक को छोड़कर शेष चुक से गए। हालांकि,

कुटिल प्रतिबद्ध आलोचकों ने इनके उन चुके हुए सहयात्रियों को शोहरत की

बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए क्या-क्या कुकर्म नहीं किए।खैर, सुधीर सक्सेना

की अब तक आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें हैं- 'बहुत दिनों के बाद' इनका

पहला काव्य-संग्रह है और अभी-अभी प्रकाशित एक काव्य-पुस्तक है-

'अर्धरात्रि है यह' वस्तुतः यह चालीस पेज की एक काव्य पुस्तिका है, जिसमें

सिर्फ एक लंबी कविता है। मार्क्सवादी प्रगतिशीलता, आधुनिक मानवतावाद

और लोकानुराग के तत्वों से निर्मित एक कवि किसी वाद, विचार और

चिंतन-पद्धति से सर्वथा मुक्त होकर भी एक जनवादी अन्वेषक है। सुधीर

सक्सेना की काव्यभाषा में अद्भुत गतिशीलता है और दृढ़ फलक विश्वव्यापी।

इनकी कविताओं में अत्यधिक कलात्मक तराश का आग्रह होने से उनमें

सहजता और बोधगम्यता साफ देखी जा सकती है। इन्हें 'पुश्कीन सम्मान',

'वागेश्वरी सम्मान', 'सोमदत्त सम्मान' और 'प्रमोद वर्मा सम्मान' आदि कई

सम्मान मिल चुके हैं। अभी वह हिंदी पाक्षिक पत्रिका 'दुनिया इन दिनों' के

संपादक हैं।

सुधीर के कविता कर्म के सटीक आकलन के मान से वरिष्ठ कवि-

आलोचक ओम भारती की निम्न टिप्पणी अत्यंत सारगर्भित हैं : आठवें दशक

के आखिर में 'पश्यंती' के कविता विशेषांक में सम्मिलित युवा कवि सुधीर

 

सक्सेना को लिखते हुए प्रायः चार दशक हो चुके हैं। इन चार दशकों में

'बहुत दिनों के बाद' (कविता संग्रह) तथा 'बीसवीं सदी : इक्कीसवीं सदी'

(लंबी कविता की पुस्तिका) तथा बाद में अनेक कविता संकलनों और लंबी

कविताओं के प्रकाशन से उनकी एक खास पहचान बनी है। हालांकि, सुधीर

की पहली किताब देर से आयी, लेकिन उसकी ताजगी, तेवर और मिजाज

अलग से पहचाने गये। इसी तरह 'बीसवीं सदी : इक्कीसवीं सदी' से पाठकों ने

पाया कि यह कवि इतिहास रहित, समय रहित 'स्पेस' में नहीं जीता है। वह

इतिहास-चेतना और दृष्टि का कवि है। राजनीतिक-सामाजार्थिक मसलों और

संघर्षों के साये से सहमे अनेक समकालीनों के विपरीत वे समय का सीधा

सामना और उससे मुठभेड़ करने वाले कवि हैं। एक जीवित और स्पंदित

कल, आज और कल से वे शिद्दत के साथ जुड़े हुए हैं। इतिहास और भूगोल

उन्हें सीमित नहीं, सुविस्तृत करते हैं। उनकी कविता में कोई भी जगह दिक्

और काल से रहित नहीं है। सुधीर के लिए इतिहास मात्र कल का कूड़ा नहीं

है, लिहाजा ऐतिहासिक स्थानों और पात्रों से उनका काव्य सलूक सचेत और

सतर्क है। इतिहास तथा भूगोल के सीमांतों को सहजता से अतिक्रमित करते

हुएसमरकंद में बाबर' की कविताएं वैश्विक पर्यावरण में आकार लेती हैं।

सुधीर यह नहीं भूलते कि मनुष्य ने अपने इतिहास को रचते और प्रभावित

करते हुए जो लंबा सफर तय किया है, उसमें आज का मुकाम सबसे ज्यादा

चुनौतीपूर्ण और पुरजोखिम है। कतिपय साम्राज्यवादी एवं उपनिवेशवादी ताकतें

हमारी दुनिया को रौंदती चली रही हैं। तकनीकी औजारों ने नवपूंजीवाद

को दुस्साहसी और मानवीय अस्मिता को असुरक्षित कर दिया है। ऐसे समय में

सुधीर की कविताएं मानवीय जिजीविषा और संघर्षशीलता का तिलक करती

हैं। इधर कविता के बहुत्तांश की तरह ये विकलांग गद्य में भटक कर नहीं रह

जातीं, बल्कि जीवन की आंतरिक लय को अपनाते हुए प्रवाह पा लेती हैं।

नव्य रूपवादी रूझानों से मुक्त यह काव्यात्मकता और भाषाई तरलता हिन्दी

 

 

कविता के इतिहास में अपहचानी नहीं रहेगी, यह विश्वास किया जा सकता है,

और यह भी कि तो इतिहास का अंत हो सकता है और ही कविता का

सुधीर के शब्द-विन्यास और भाषा-लोक के बारे में टिप्पणी करते हुए

लीलाधर मंडलोई कहते हैं, "शब्दों का नया इजाफा, संग्रह में अलग से

देखने योग्य है। शिल्प में कसावट है, जो तुम्हारी अपनी खूबी है। अमूर्त भी

मूर्त है.. अनसुना भी सुना-सा।'' ('किताबें दीवार नहीं होती' पर सुधीर को

संबोधित पत्र) मंडलोई आगे लिखते हैं- "कविताएं एक अर्थात्मक संगीत में

यात्रा करती हैं। लगता है, यह एक लंबी कविता है... यहां अनुपस्थितियों की

उपस्थिति है... अवकाशों का स्पन्दन... अनात्मीय इस संसार में यहां सबसे

विरल आत्मीयता का उजागर है।

कवि सुधीर सक्सेना 'किताबे दीवार नहीं होती' कविता-संग्रह में सोमदत्त

के लिए लिखी कविता में एक कवि किस तरह कविता की तलाश करता है,

के मर्म को समझाने का प्रयास किया है। कविता का शीर्षक है, 'कविता की

तलाश में':

"खड़े रहे तुम

खुले आसमान तले कविता के बीहड़ में

ताउम्र

लोहे की किल्ली की तरह

देखते रहे चमकीली आंखों से

पारदर्शी दीवार के आर-पार

झरता रहा लोना

ढहते रहे गुंबद

भरभराती रही इट।

 

कविता के संसार में

बचे रहे तुम

मोरचा नहीं खाया तुमने ताउम्र

हवा, पानी और धूप में

अहर्निश भीगने के बावजूद।

अतल गहराइयों में समुंदर की

सवार हो किसी मछली की पीठ पर

तुम खोजते रहे

कविता।

हर कहीं

यहां तक कि पामीर के पार गए तो वहां भी

तलाशते रहे कविता

भटकते रहे ताउम्र तुम

कविता की तलाश में।"

-

कविता की प्यास किस कदर किस कवि में होती है, उसकी तलाश में वह

सारी जिंदगी गुजार देता है। कभी-कभी आजीवन उसकी अभिव्यक्ति के शब्द

तक नहीं मिल पाते और वह कविता अधूरी रह जाती है और उसका दुःख दर्द

वह अनुभव करता है। उसकी अभिव्यक्ति, सीताकांत जी के कविता संग्रह

'पूछे किससे कहो' में संकलित कविता 'प्रिय कवि भाषा खोज रही मनुष्य'

का अंतिम पद्यांश पाठकों के लिए प्रस्तुत है:

"प्रिय कवि, जितने अभिमान चाहे तुम्हारे मन में हो

 

पूछो तो अपने हृदय को

नीरव हो सकेगा, खो सकेगा अपनी सीमाहीन मौनता को

खोज रहे है मनुष्य तुम्हारे कंठ में अपनी खोई भाषा

कह सकने का दुःख,

आंसू, खून, स्वेद, स्नेह

सराग, मंत्रणा, प्रेम, क्रोध, आर्त भाषा

आकाश से परिव्याप्त और नील

सागर से और गंभीर

उपयुक्त एक शब्द, एक पद भाषा।"

कवि सुधीर सक्सेना कविताओं के बारे में लिखते हैं कि कविताएं प्रिज्म

की तरह होती हैं। कभी सीधे तो कभी औंधे प्रिज्म की तरह। प्रिज्म प्रकाश की

रेखा को उसके वर्णक्रम में छितरा देता है। कविता भी अनुभूतियों की रेखाओं

को शब्दों के पटल पर आंक देती है। कविता का अपना 'विबग्योर' होता है।

विविध रंगों की पट्टियां। कोई चटख। कोई धूमिल। कोई बारीक। तो कोई

स्थूल। कभी-कदाच कोई रंग अपने आप का अतिक्रमण करता हुआ। टांपता

हुआ किसी दूसरे रंग को। कभी थोड़ा। कभी कुछ ज्यादा।

'किताबें दीवार नहीं होती' कविता-संग्रह की भूमिका में वह लिखते हैं कि

कवि के मित्र संसार में सिर्फ कवि नहीं होते। वहां कवि होते हैं और बहुतेरे वे

भी, जिनका कविता से कोई वास्ता नहीं होता। मगर कविता का वास्ता सबसे

होता है। कविता के लिए कुछ विजातीय या वर्जित नहीं होता। उसे किसी भी

चीज में वितृष्णा होती है और ही किन्हीं लोगों से विरक्ति। हां, नेकी और

बदी के अनवरत द्वंद्व में वह सदा नेकी के साथ खड़ी होती है, अपनी पूरी

ताकत और हौसले के साथ। कविता का स्वप्न है कि इस बेढब लड़ाई में

 

 

अंतिम विजय नेकी की हो। कविता सदैव सत्, शिव और सुंदर की प्रभावी

विजय की कामना करती है। यथार्थ के कठिन दुर्गम बीहड़ों में भटकती

कविता की यह संचित अभिलाषा है। अतीत के हादसों की किरचें हमारे जिस्म

और जेहन में गहरे धंसी है, फिर भी हमें एक 'यूटोपिया' चाहिए। यूटोपिया हो

तो आंधी-पानी में भी शम्अरोशन रहती है।

कविता लिखने के लिए कवि सुधीर सक्सेना का मन प्राकृतिक सौंदर्य से

भाव-विभोर होकर फिर प्रेरित होता है। उनके कविता संग्रह 'समरकंद में

बाबर' में संकलित कविता 'लिखू एक कविता' की इन पंक्तियों से :-

'जी करता है

पहाड़ के चौड़े कंधों पर

सूखने को डाल दूं

अपनी कमीज।

बोतलों में

जुगनुओं की तरह

बंद कर लूं तारों को

जो सदियों से चमचमाते रहे है

मेरे ही वास्ते।

जी करता है

लिखू एक कविता

और

काल की नाभि पर

फेंकू उसे लटू की तरह

इस तरह

इस तरह

 

 

कंपित कर दूं

थरथरा दूं उसकी समूची देह।"

जिस समस्या पर कवि सीताकांत जी ने पूर्व में अपने आलेख में यह सवाल

उठाया था कि आधुनिक संवेदनहीन समाज में कविता लिखने की क्या प्रासंगिकता

है? क्या ये कविताएं समाज में कुछ नैतिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक

प्रभाव डालने में सक्षम हैं?

इसी सवाल को अन्य शब्दों में आलोचक उमाशंकर सिंह परमार कवि

सुधीर सक्सेना से साक्षात्कार के दौरान पूछते हैं कि आज चारों तरफ शोर हो

रहा है कि कविता के समक्ष संकट है और कविता खतरे में है। आप इस

शोरगुल को किस नजरिए से देखते हैं?

कवि सुधीर सक्सेना उत्तर देते है कि कविता के समक्ष सदैव चुनौतियां रही

हैं। यदि चुनौती हो तो कविता भी नहीं बनती है। चुनौतियों से मुठभेड़ का

माद्दा भी कविता रखती है। आप किसी भी समय की कविता को ले लीजिए।

कहीं कहीं वह संकटों के खिलाफ ही रही है। मध्यकाल में भक्त कवियों ने

कट्टरता और जातिवाद का मुकाबला किया, तो तुलसी जैसे महाकवि ने

रामकथा को भाषा में कहने का दंड अपने ही जमात के विरोधों के रूप में

झेला। भारतेन्दु ने अंग्रेजों की चुनौती स्वीकार की और कहा, 'हा, हा, भारत

दुर्दशा देखी जाई' और यह भी कि, 'पै निज धन विदेश चलु जात यहै अति

ख्वारी।' तो मैथिली शरण गुप्त और हरिऔध ने सामाजिक रूप से व्याप्त जन

विरोधी आदतों का प्रतिरोध कर उदात्त संस्कारों और संसलार की पैरवी की।

आज कविता के सामने संकट है तो यह नई बात नहीं है। हमें बजाय खतरा-

खतरा चीखने के रचनात्मक प्रतिरोध करना चाहिए। यदि चुनौतियों का मुकाबला

करने के लिए हमें एकजुट होकर सड़क पर उतरना पड़े तो हमें उतरना

चाहिए। यही कवि होने की ईमानदारी है। याद रखें कि सृष्टि की पहली

 

 

कविता भी प्रतिरोध और करूणा से उपजी है।

सुधीर सक्सेना के इस उत्तर को कविता की भाषा कवि सीताकांत महापात्र

देते हैं। कविता क्यों लिखी जाए? किसके लिए लिखी जाए?